Monday, January 20, 2014

विचारों का प्रभाव

I  have written it for my school magazine when i was studying in class XII.Hope you all will like it.

writing

Saturday, January 4, 2014

सपने कहाँ गये ?

I am writing this blog after reading a book “सपने कहाँ गये ? ‘’ by a great hindi sahitya writer “Vidya Niwas Mishra”.

I am going to share some of his lines about the situation of country and our dreams.

Before 1947, there was a big impact of Hindi Sahitya on us. He described the thoughts of people by a poem “मैने आहुति बनकर देखा” created by “अज्ञेय जी” :

‘काँटा कठोर है, तीखा है उसमे उसकी मर्यादा है

मै कब कहता हूँ वह घटकर प्रातंर का फूल बने । '

Later in this book he has written about current situation of India :

‘…. .. राजनीतिक मंच पर जो कुछ घटित हुआ है उसका कारण केवल राजनेता नही है । राजनेताओ को चुनने वाले और उन्हे, राजनेता है सिर्फ  इसलिये सम्मान देने वाले भी सभी लोग है । …

… राजनीति पूजा का सबसे बुरा प्रभाव शिक्षा पर पड़ा और शिक्षा  जिस  बिन्दू पर पहुँची है  उसके बारे मे कुछ भी कहने की आवश्यकता नही है । प्राथमिक शिक्षा केवल नक्शे मे है और माध्यमिक शिक्षा केवल आँकड़ो मे है । उच्च शिक्षा एक ऐसा प्लेटफार्म है, जहाँ पर गाड़ी मे बैठने  की जगह की प्रतीक्षा करते- करते  लोग इतने उब जाते है कि खोमचे लुटने लग जाते हैं।  प्लेटफार्म एक – दो घण्टे की प्रतीक्षा की जगह होती है, पूरी जिंदगी प्रतीक्षा के लिए नहीं । पर शिक्षा नीति की  उद्घोषणा के बावजूद  शिक्षा राजनीतिक रमझल्ले का शिकार हुई है । और शिक्षा संस्थाएँ, उनके पुस्तकालय, उनके खेलने का मैदान, उनके पढने – पढाने की जगह – सब एक मेले का परिवेश उपस्थित करते हैं, जहाँ अपना ही शब्द सुनाई नही पड़ता । मै यह नही कहता कि इसका दोष केवल राजनीति का है ।

            पर राजनीति ही तो व्यवस्था देती है । और यदि राजनीति स्वयं अव्यवस्थाओं के बीच चलती रही तो उसे व्यवस्था के बारे में सोचने की फुर्सत कहाँ ! यही स्वाधीनीता के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी रही है । ..’

He mentioned about solutions :

‘देश के साधारण लोगो तुम क्यो दूसरो के चलाये-दिखाये पर चलते और देखते  हो । इन गलत चाल सिखाने वालों को तुम सीधे नकार क्यों नही देते ।

      यह काम देश मे आरम्भ होना चाहिये । किसीको तो आरम्भ करना चाहिये । यों देखने मे यह काम असंभव लगता है, पर जहाँ संभावनाये इतनी चुक गई है, वहाँ शुरूआत तो असंभव से ही होगी ।’

He , Vidya Niwas Mishra , has written this book  in 1998 but I still find his lines very correct. What do you think? Please comments or share if you are agree.